ईरान में इंटरनेट ब्लैकआउट के बावजूद हमलों के वीडियो कैसे हो रहे हैं वायरल? अभी जानिए सब कुछ

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<p style="text-align: justify;"><strong>Iran-Israel War:</strong> मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच हालात उस समय और सनसनीखेज हो गए जब ईरान के सर्वोच्च नेता Ayatollah Ali Khamenei की मौत की खबर सामने आई. बताया गया कि 28 फरवरी की सुबह तेहरान स्थित उनके आधिकारिक आवास और दफ्तर परिसर पर हमला हुआ. इस घटनाक्रम ने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया. लेकिन इसके साथ ही एक बड़ा सवाल भी उठ खड़ा हुआ आखिर इतनी सख्त सुरक्षा के बीच उनकी सटीक लोकेशन कैसे पता चली?</p>
<p style="text-align: justify;">रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं था बल्कि लंबे समय से चल रही गुप्त निगरानी का नतीजा था. अमेरिकी खुफिया एजेंसी Central Intelligence Agency ने कथित तौर पर महीनों तक उनके मूवमेंट, मुलाकातों और दिनचर्या का विश्लेषण किया. इस तरह की निगरानी को केवल तकनीकी ट्रैकिंग नहीं बल्कि बिहेवियरल एनालिसिस भी कहा जाता है जिसमें किसी व्यक्ति के पैटर्न को समझकर उसकी संभावित मौजूदगी का अनुमान लगाया जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;">अंतरराष्ट्रीय मीडिया में यह भी चर्चा रही कि उस दिन हमले से कुछ समय पहले शीर्ष अधिकारियों की एक अहम बैठक उसी परिसर में चल रही थी. इसी इनपुट को एक अहम विंडो माना गया. सूत्रों के अनुसार, इकट्ठा की गई जानकारी को साझा किए जाने के बाद हमले की रणनीति और समय में बदलाव किया गया. हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि अब तक सामने नहीं आई है.</p>
<p style="text-align: justify;">इसी बीच एक और दिलचस्प पहलू चर्चा में आया. कहा गया कि ऑपरेशन की योजना बनाने और इंटेलिजेंस डेटा को प्रोसेस करने में एडवांस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल्स की मदद ली गई. कुछ रिपोर्ट्स में Claude नामक एआई सिस्टम का जिक्र हुआ जिसे Anthropic ने विकसित किया है.&nbsp;</p>
<p style="text-align: justify;">दावा किया गया कि ऐसे टूल्स बड़े पैमाने पर डेटा का विश्लेषण कर संभावित टारगेट की पहचान और सिमुलेशन में मदद कर सकते हैं. हालांकि इस बारे में भी कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है.</p>
<p style="text-align: justify;">तकनीक के इस कथित इस्तेमाल ने यह साफ कर दिया है कि आधुनिक युद्ध केवल हथियारों से नहीं बल्कि डेटा, एल्गोरिद्म और निगरानी क्षमताओं से भी लड़े जा रहे हैं. आज की दुनिया में लोकेशन ट्रैकिंग सिर्फ जीपीएस तक सीमित नहीं रही बल्कि सैटेलाइट इमेजरी, डिजिटल कम्युनिकेशन पैटर्न और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के संयोजन से बेहद सटीक आकलन संभव हो गया है. यही वजह है कि इस पूरे घटनाक्रम ने पारंपरिक जासूसी और हाई-टेक वॉरफेयर की नई तस्वीर दुनिया के सामने रख दी है.</p>

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