अब बिना पेड़ के भी मिलेगा ऑक्सीजन! आ गया देश का पहला मोबाइल Liquid Tree SALT, जानें क्या है टेक्नोलॉजी

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<p style="text-align: justify;"><strong>Liquid Tree SALT:</strong> वायु प्रदूषण देश की एक बड़ी समस्या बन चुकी है. खासतौर पर बड़े शहरों में वायु प्रदूषण से कई लोग बीमार पड़ रहे हैं. यहां तक इसका असर बच्चों पर भी देखने को मिल रहा है. फेफड़ों से संबंधित बीमारियां भी वायु प्रदूषण की वजह से काफी बढ़ चुकी हैं. इसी को देखते हुए अब वैज्ञानिकों ने एक ऐसी टेक्नोलॉजी तैयार की है जिसकी मदद से अब लोगों को ज्यादा ऑक्सिजन मिल सकेगी. जी हां, दरअसल, हर जगह पर पेड़ लगाना संभव नहीं है, इसीलिए वैज्ञानिकों ने एक मोबाइल लिक्विड पेड तैयार किया है. आइए जानते हैं क्या है ये टेक्नोलॉजी और कैसे काम करता है.</p>
<h2 style="text-align: justify;">देश का पहला लिक्विड ट्री</h2>
<p style="text-align: justify;">मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, <a href=" इंस्टीट्यूट</a> ऑफ माइनिंग एंड फ्यूल रिसर्च (CSIR-CIMFR) के वैज्ञानिकों ने भारत का पहला मोबाइल लिक्विड ट्री तैयार किया है. इस नई टेक्नोलॉजी का नाम स्मार्ट एल्गल लिक्विड ट्री (SALT) रखा गया है. इसका मकसद बड़े शहरों और ज्यादा प्रदूषित इलाकों में एयर क्वालिटी को बेहतर करना है.</p>
<h2 style="text-align: justify;">कैसे कम करेगा प्रदूषण</h2>
<p style="text-align: justify;">बता दें कि SALT के काम करने का तरीका पेड़ों से काफी मिलता-जुलता है. इस सिस्टम के तहत जब भी प्रदूषित हवा इस सिस्टम के संपर्क में आती है तो उसमें मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड को माइक्रोएल्गी खींच लेती है. इसके बाद फोटोसिंथेसिस प्रोसेस के जरिए ऑक्सीजन को हवा में छोड़ दिया जाता है.</p>
<p style="text-align: justify;">इतना ही नहीं, इस सिस्टम की एक और खास बात ये है कि ये सिर्फ सूरज की रौशनी पर निर्भर करती है. हालांकि, जरुरत पड़ने पर ये आर्टिफिशियल लाइट पर भी आसानी से काम कर सकती है.</p>
<h2 style="text-align: justify;">कैसे काम करती है ये टेक्नोलॉजी</h2>
<p style="text-align: justify;">आपको बता दें कि SALT यानी Smart Algal Liquid Tree एक छोटा और पोर्टेबल एयर प्यूरीफिकेशन सिस्टम है जिसमें पानी के साथ बहुत छोटे Microalgae का इस्तेमाल किया जाता है. ये टेक्नोलॉजी Photosynthesis के प्रोसेस को एक बंद सिस्टम के अंदर रिपीट करती है.</p>
<p style="text-align: justify;">इस परियोजना को पहले ही झारखंड के धनबाद स्थित CSIR-CIMFR परिसर और मध्य प्रदेश के सिंगरौली में नॉर्दर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड के परिसर में स्थापित किया जा चुका है. इसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी मोबिलिटी है यानी इसका मतलब ये है कि इसे एक जगह से दूसरे जगह पर बहुत आसानी से ले जाया जा सकता है.</p>
<h2 style="text-align: justify;">क्या असली पेड़ की जगह लग सकती है ये टेक्नोलॉजी</h2>
<p style="text-align: justify;">जी हां, वैज्ञानिकों का कहना है कि इस टेक्नोलॉजी का मकसद ऐसी जगहों पर इसे इस्तेमाल करना जहां पर पेड़ लगाना पूरी तरह से असंभव है. लेकिन जहां पर पेड़ लगाए जा सकते हैं या फिर वे पहले से मौजूद हैं, उन जगहों पर इसका इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है. इसे सिर्फ एक ऑप्शन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है न कि असली पेड़ों की जगह पर इस्तेमाल करने के लिए.</p>
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