<p style="text-align: justify;"><strong>Mini Drones:</strong> दुनिया में ड्रोन तकनीक तेजी से आगे बढ़ रही है लेकिन सबसे बड़ी चुनौती अब भी यही है कि छोटे ड्रोन बिना भारी सिस्टम के सही रास्ता कैसे ढूंढें. अब यूरोप के वैज्ञानिकों ने इसका समाधान प्रकृति से लिया है. शोधकर्ताओं ने ऐसी नई तकनीक विकसित की है जो मधुमक्खियों के रास्ता याद रखने के तरीके से प्रेरित है. इसकी मदद से बेहद छोटे ड्रोन भी कम मेमोरी और कम ऊर्जा में लंबी दूरी तय कर सकेंगे.</p>
<h2 style="text-align: justify;">मधुमक्खियों के दिमाग से मिला आइडिया</h2>
<p style="text-align: justify;">यह रिसर्च यूरोप के वैज्ञानिकों ने मिलकर की है. <a href=" में बताया गया कि शहद की मधुमक्खियां अपने छोटे से दिमाग के बावजूद दूर-दूर तक उड़ान भरकर आसानी से वापस अपने छत्ते तक पहुंच जाती हैं. वैज्ञानिकों ने इसी क्षमता को समझकर Bee-Nav नाम की नई नेविगेशन तकनीक तैयार की. इस सिस्टम का मकसद ऐसे छोटे रोबोट और ड्रोन बनाना है जो बिना बड़े कंप्यूटर या भारी डिजिटल मैप के खुद रास्ता पहचान सकें.</p>
<h2 style="text-align: justify;">कैसे काम करता है Bee-Nav सिस्टम?</h2>
<p style="text-align: justify;">यह तकनीक बिल्कुल युवा मधुमक्खियों की तरह काम करती है. जब ड्रोन पहली बार उड़ान भरता है तो वह अपने आसपास की जगह की तस्वीरें कैप्चर करता है. इसके बाद एक छोटा न्यूरल नेटवर्क उन तस्वीरों के जरिए यह सीखता है कि वापस घर यानी शुरुआती स्थान तक कैसे पहुंचना है.</p>
<p style="text-align: justify;">ड्रोन दूरी और दिशा का अंदाजा लगाने के लिए ओडोमेट्री तकनीक का इस्तेमाल करता है. यह कुछ वैसा ही है जैसे इंसान चलते समय कदम गिनकर दूरी का अनुमान लगाता है. लेकिन सिर्फ यही तरीका हमेशा सही नहीं होता, इसलिए ड्रोन आसपास के दृश्य भी याद रखता है.</p>
<h2 style="text-align: justify;">बेहद कम मेमोरी में चलता है पूरा सिस्टम</h2>
<p style="text-align: justify;">सबसे हैरानी वाली बात यह रही कि इस तकनीक को बहुत कम मेमोरी की जरूरत पड़ी. कुछ टेस्ट में पूरा न्यूरल नेटवर्क केवल 3.4 किलोबाइट मेमोरी पर काम करता दिखा. बड़े आउटडोर टेस्ट में भी पूरा सिस्टम सिर्फ 42 किलोबाइट मेमोरी में चल गया. तुलना करें तो मौजूदा ड्रोन नेविगेशन सिस्टम इसके मुकाबले कई गुना ज्यादा स्टोरेज और प्रोसेसिंग पावर मांगते हैं. यही वजह है कि छोटे ड्रोन भारी और महंगे हो जाते हैं.</p>
<h2 style="text-align: justify;">600 मीटर दूर जाकर भी लौट आया ड्रोन</h2>
<p style="text-align: justify;">वैज्ञानिकों ने इस तकनीक का परीक्षण इनडोर और आउटडोर दोनों जगह किया. नीदरलैंड के एक ड्रोन टेस्टिंग सेंटर में ड्रोन को 600 मीटर से ज्यादा दूर भेजा गया और वह सफलतापूर्वक वापस लौट आया. हालांकि तेज हवा में ड्रोन को दिक्कत हुई क्योंकि हवा के कारण उसका संतुलन बिगड़ गया और तस्वीरें सही तरीके से पहचानना मुश्किल हो गया. इसके बावजूद आउटडोर टेस्ट में करीब 70 प्रतिशत सफलता मिली.</p>
<h2 style="text-align: justify;">खेती और ग्रीनहाउस में हो सकता है बड़ा इस्तेमाल</h2>
<p style="text-align: justify;">शोधकर्ताओं का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में खेती और ग्रीनहाउस मॉनिटरिंग में बेहद उपयोगी साबित हो सकती है. हल्के ड्रोन फसलों की जांच कर पाएंगे और बीमारी या कीटों का पता लगा सकेंगे वह भी बिना इंसानों के लिए खतरा बने.</p>
<h2 style="text-align: justify;">प्रकृति से मिल रहे तकनीक के नए जवाब</h2>
<p style="text-align: justify;">इस रिसर्च ने एक बार फिर साबित किया है कि प्रकृति के छोटे जीव भी आधुनिक तकनीक के लिए बड़ी प्रेरणा बन सकते हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि मधुमक्खियों को समझकर इंसान ऐसी स्मार्ट तकनीक बना सकता है जो कम खर्चीली, हल्की और ज्यादा प्रभावी हो.</p>
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